दर्शन शास्त्र में एक हे ''वैशेषिक दर्शन'' जो महर्षि कणाद जी ने रचना कीए। उनका नाम कणाद पड़ा क्योंकि कथित है वे खेत मे किसान धान काट लेने के बाद जो कण पड़े रहते थे उस से जीवन धारण करते थे। कुछ विद्वान ये भी कहते है ''कण'' अर्थात अनु विज्ञान पर उन्होंने कई सिद्धान्त के रचना कीये इसलिए इनको कणाद कहते है। सिर्फ अनु विज्ञान नही द्रव्य और गुण अनुसार उसका आचरण , वस्तु में स्थिति और गति के नियम सव कुछ मिलता है ''वैशेषिक दर्शन'' में।
गति के नियम : महर्षि कणाद | Laws of Motion by Maharishi Kanada :
इस संसार को गति के नियम महर्षि कणाद ने दिए है ना की कोई न्यूटन फ्यूटन ने । वैशेषिक दर्शन (Vaisheshika Sutra) के रचनाकार महर्षि कणाद लगभग २ या ६ ईसा पूर्व प्रभास क्षेत्र द्वारका के निकट गुजरात में जन्मे । दुनिया को पहला परमाणु का ज्ञान देने वाले भी ऋषि कणाद ही है । इन्ही के नाम परपरमाणु का एक नाम कण पड़ा । वैशेषिक दर्शन में इन्होने गति के लिए कर्म शब्द प्रयुक्त किया है । इसके पांच प्रकार हैं यथा :
उत्क्षेपण (upward motion)
अवक्षेपण (downward motion)
आकुञ्चन (Motion due to the release of tensile
stress)
प्रसारण (Shearing motion)
गमन (General Type of motion)
विभिन्न कर्म या motion को उसके कारण के आधार पर जानने का विश्लेषण वैशेषिक में
किया है।
(१) नोदन के कारण-लगातार दबाव
(२) प्रयत्न के कारण- जैसे हाथ हिलाना
(३) गुरुत्व के कारण-कोई वस्तु नीचे गिरती है
(४) द्रवत्व के कारण-सूक्ष्म कणों के प्रवाह से
Dr. N.G. Dongre अपनी पुस्तक 'Physics in Ancient India' में वैशेषिक सूत्रों के ईसा की प्रथम
शताब्दी में लिखे गए प्रशस्तपाद भाष्य में उल्लिखित वेग संस्कार और न्यूटन द्वारा 1675 में खोजे गए गति के नियमों
की तुलना की है । महर्षि प्रशस्तपाद लिखते हैं।
‘वेगो पञ्चसु द्रव्येषु निमित्त-विशेषापेक्षात् कर्मणो जायते नियतदिक् क्रिया प्रबंध हेतु:
स्पर्शवद् द्रव्यसंयोग विशेष विरोधी क्वचित् कारण गुण पूर्ण क्रमेणोत्पद्यते।‘
अर्थात् - वेग या मोशन पांचों द्रव्यों (ठोस, तरल, गैसीय) पर निमित्त व विशेष कर्म के कारण उत्पन्न होता है तथा नियमित दिशा में क्रिया होने के कारण संयोग विशेष से नष्ट होता है या उत्पन्न होता है। उपर्युक्त प्रशस्तिपाद के भाष्य को तीन भागों में विभाजित करें तो न्यूटन के गति सम्बंधी नियमों से इसकी समानता ध्यान आती है।
(१) वेग: निमित्तविशेषात् कर्मणो जायते
The change of motion is due to impressed force (Principle) 1st law of motion 👈
(२) वेग निमित्तापेक्षात् कर्मणो जायते नियत्दिक् क्रिया प्रबंध हेतु
The change of motion is proportional to the motive force impressed and is made in the direction of the right line in which the force is impressed (Principle) 2nd law of motion 👈
(३) वेग: संयोगविशेषाविरोधी
To every action there is always an equal and opposite reaction (Principle) 3rd law of motion👈
वैशेषिक सूत्र में गति के साथ साथ ब्रह्माण्ड , समय तथा अणु /परमाणु का ज्ञान भी है जिसके अंग्रेज भी बहुत दीवाने है देखिये , ये निम्न एक पीडीऍफ़ फाइल दे रहा हूँ ये मुझे अमेरिका के एक कॉलेज की साईट पर मिली
Division of Electrical & Computer Engineering,
School of Electrical Engineering and Computer
Science
3101 P. F. Taylor Hall • Louisiana State
University • Baton Rouge, LA 70803, USA
Space, Time and Anu (Atom) in Vaisheshika ->
http://www.ece.lsu.edu/kak/roopa51.pdf
चाहे तो http://www.ece.lsu.edu/ में जाएँ और सर्च बॉक्स में kanad लिखें अंग्रेज हमारी चीजें पढ़ कर हमें पढ़ा रहे है वो भी अपने नाम से , कैसे दिन आ गये !!
http://phys.org/news106238636.html
वैशेषिक सूत्र आप पढना चाहें तो यहाँ से डाउनलोड कर सकते है :--
http://www.jainlibrary.org/elib_master/
jlib/002501_book_hindi_21/Vaisheshika_Sutra_
कितनी दुख की वात है अंग्रेज सिख रहे।
भारतीय को सिखाया नही गया😥😥😥



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